कबीर सागर

‘‘पवित्र कबीर सागर में अद्धभुत रहस्य‘‘

 ‘‘अनुराग सागर’’ :- यह अध्याय कबीर सागर का ही अंग है।

वर्तमान कबीर सागर के संशोधन कर्ता श्री युगलानन्द बिहारी (प्रकाशक एवं मुद्रक-खेमराज श्री कृष्ण दास, श्री वेंकेटेश्वर प्रैस मुंबई) द्वारा अपने प्रस्तावना में लिखा है कि मेरे पास अनुराग सागर की 46 (छियालिस) प्रतियाँ हैं। जिनमें हस्त लिखित तथा प्रिन्टिड हैं। सभी की व्याख्या एक दूसरे से भिन्न हैं। अब मैंने (श्री युगलानन्द जी ने) शुद्ध करके सत्य विवरण लिखा है।

विवेचनः- श्री युगलानन्द जी ने अनुराग सागर पृष्ठ 110 पर लिखा है कि धर्मदास साहेब जी नीरू का अवतार अथार्त् नीरू वाली आत्मा ही धम र्दास रूप में जन्मी थी तथा नीमा वाली आत्मा ही आमनी रूप में जन्मी थी। वाणी बना कर लिखी है, कबीर वचन :-

चलेहु हम तब सीस नवाई, धर्मदास अब तुम लग आई। धर्मदास तुम नीरू अवतारा, आमिनि नीमा प्रगट बिचारा।।

तथा ‘‘ज्ञान सागर’’ पृष्ठ नं. 72 पर धर्मदास को नीरू अवतार नहीं लिखा है तथा नीरू के स्थान पर नूरी लिखा है।

विशेषः- पुस्तक ‘‘धनी धम र्दास जीवन दर्शन एवं वंश परिचय’’ दामाखेड़ा से प्रकाशित पृष्ठ नं. 9 पर लिखा है। धर्मदास जी का जन्म संवत् 1452 (सन् 1395) तथा कबीर सागर ‘‘कबीर चरित्र बोध’’ पृष्ठ-1790 पर कबीर जी के जन्म के विषय में लिखा है कि संवत् 1455 (सन् 1398) ज्येष्ठ शुद्धि पूणि र्मासोमवार के दिन सतपुरूष का तेज काशी के लहरतारा तालाब पर उतरा अर्थात् कबीर जी बालक रूप में प्रकट हुए।

पृष्ठ नं. 1791, 1792 (कबीर चरित्र बोध) पर लिखा है कि नीरू जुलाहा तथा उसकी पत्नी नीमा चले आ रहे थे। उन्हें एक बालक देखा उसे उठा लिया।

पृष्ठ नं. 1794 से 1818 तक आदरणीय गरीबदास जी महाराज (छुड़ानी-हरियाणा वाले) की वाणी के द्वारा महिमा समझाई है। सन्त गरीबदास जी महाराज की वाणी लिखी है (यह भी कबीर सागर में प्रक्षेप अर्थात् मिलावट का प्रत्यक्ष प्रमाण है)

उपरोक्त विवरण से सिद्ध हुआ कि :-

(1) संत धर्मदास साहेब का जन्म सन् 1395 में तथा परमेश्वर कबीर जी का अवतरण सन् 1398 में तथा नीरू व नीमा को मिलन सन् 1398 में तो धम र्दास जी व परमेश्वर कबीर जी तथा नीरू व नीमा समकालीन हुए। यह वाणी की धम र्दास जी नीरू वाली आत्मा थी, गलत सिद्ध हुई। इससे सिद्ध हुआ कि कबीर सागर में मिलावट (प्रक्षेप) है जो दामाखेड़ा वालो द्वारा जान बूझ कर किया गया। सन्त गरीबदास जी (छुडानी-हरियाणा वाले) का जन्म सन् 1717 (सम्वत् 1774) में हुआ। जो कबीर जी के अंतर्ध्यान के 199 वर्ष बाद की गरीबदास जी की वाणी भी कबीर सागर में कबीर चरित्र बोध में लिखी है। जो प्रत्यक्ष प्रमाण करती है कि कबीर सागर में मिलावट है।

स्वसम वेद बोध (बोध सागर) पृष्ठ नं. 137 पर साखी लिखी है की काशी में भण्डारे के समय कबीर जी तो घर छोड़ कर चले गए तथा विष्णु ने भण्डारा कियाः-

भीर भई साधुन की भारी, गृह तजि सत्य कबीर सिधारी। आये विष्णु भये भण्डारी, साधुन को आदर करि भारी।।

इससे सिद्ध है कि कोइ र् नकली कबीर पंथी मिलावट कर्ता श्री कृष्ण का भी पुजारी है तथा सत् कबीर जी की महिमा से अपरिचित है।

विशेष विवरणः- कबीर सागर ‘‘कबीर चरित्र बोध’’ पृष्ठ नं. 1862 से 1865 तक लिखा है कि कलयुग में कबीर साहेब ने चार गुरू नियत किये हैं।

(1) धर्मदास जी जिस के बयालिश वंश है तथा ‘‘उत्तर’’ में गुरूवाई सौंपी है।

(2) दूसरे चतुर्भुज ‘‘दक्षिण’’ में गुरूवाई करेगें।

(3) तीसरे बंक जी ‘‘पूर्व’’ में गुरूवाइ र् करेगें।

(4) चौथे सहती जी ‘‘पश्चिम’’ में गुरूवाई करेगें।

जिस समय कबीर सागर लिखा गया सन् 1505 (सम्वत् 1562) में उस समय तक केवल एक धर्मदास जी ही प्रकट हुए थे। जब ये चारों गुरू प्रकट हो जाऐगें तब पूरी पृथ्वी पर केवल कबीर साहेब जी का ही ज्ञान चलेगा।

यही प्रमाण ‘‘अनुराग सागर’’ पृष्ठ नं. 104-105 पर है। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट हुआ कि कलयुग में धमर्दास जी के अतिरिक्ततीन गुरू और पृथ्वी पर प्रकट होगें, उनके द्वारा भी जीव उद्धार होगा। दामाखेड़ा वालों द्वारा बनाइ दन्त कथा गलत सिद्ध हुई कि कलयुग में केवल धर्मदास जी के वंशजों द्वारा ही जीव उद्धार सम्भव है अन्य द्वारा नहीं। यह उल्लेख कबीर सागर में कबीर वाणी पृष्ठ 160 पर लिखा है जो स्पष्ट मिलावट दिखाइ  देती है।

मुझ दास (रामपाल दास) को एक 450 वर्ष पुराना कबीर सागर प्राप्त हुआ है। जो बहुत ही जीरण-सीरण है। उसके आधार पर कबीर सागर का संशोधन किया जाएगा। ‘‘वर्तमान कबीर सागर’’ के संशोधन कर्ता श्री युगलानन्द जी ने ज्ञान प्रकाश- बोध सागर पृष्ठ नं. 37 के नीचे टिप्पणी की है कि इस ज्ञान प्रकाश की कई लीपी मेरे पास हैं परन्तु कोई भी एक दूसरे से मेल नहीं खाती। लेखक महात्माओं की कृपा से पक्षपात और अविद्या वश कबीर पंथ के ग्रन्थों की दुर्दशा हुई है।

विशेष :- भक्त जन विचार करें कि काल ने कैसा जाल फैलाया है। अपने दूतों द्वारा परमेश्वर के सत् ग्रन्थों  को ही बदलवा डाला। फिर भी सत्य को छुपा नहीं सके।

कबीर :- चोर चुराई तूम्बड़ी, गाढै पानी मांही।
वो गाढे वह उपर आवै, सच्चाई छयानी नाहिं।।

इसकी पूर्ति परमेश्वर ने संत गरीबदास जी (छुड़ानी-हरियाणा वाले) द्वारा कारवाई है। गरीबदास जी द्वारा भी संस्ययुक्त वाणी युक्त करवाई है जिस में श्री विष्णु जी की महिमा भी अधिक वर्णित है तथा सारज्ञान (तत्वज्ञान) भी गुप्त ढंग से लिखा हैं संत गरीबदास जी की वाणी में निणार्यक ज्ञान नहीं है।

कबीर जी की शक्ति से ही आदरणीय गरीबदास जी ने वाणी बोली है। कबीर जी ने जो बुलवाना था वही बुलवाया ताकि अब तक (मुझ दास रामपाल तक) भेद छुपा रहे। अब उसी बन्दी छोड़ कबीर परमेश्वर जी ने वह पूर्ण ज्ञान (तत्वज्ञान) मुझ दास (रामपाल दास) तेरहवां वंश द्वारा प्रकट कराया है।

कबीर वाणी पृष्ठ 134 :- ‘‘वंश प्रकार’’

प्रथम वंश उत्तम ।1। दूसरा वंश अहंकारी ।2। तीसरा वंश प्रचंड ।3। चौथे वंश बीरहे ।4। पाँचवें वंश निद्रा ।5। छटे वंश उदास ।6। सांतवें वंश ज्ञानचतुराई ।7। आठे द्वादश पन्थ विरोध ।8। नौवं वंश पंथ पूजा ।9। दसवें वंश प्रकाश ।10। ग्यारहवें वंश प्रकट पसारा ।11। बारहवें वंश प्रगट होय उजियारा ।12। तेरहवें वंश मिटे सकल अँधियारा ।13।

भावार्थ :- उपरोक्त विवरण में प्रथम वंश जो उत्तम लिखा है वह चूड़ामणी साहेब के विषय में है, दूसरा वंश अहंकारी लिखा है ‘‘यागौदास’’ पंथ है,  तीसरा वंश प्रचण्ड लिखा है, यह सूरत गोपाल पंथ है, चौथा वंश बीरहे लिखा है, यह ‘‘मूल निरंजन पंथ’’ है। पांचवाँ वंश ‘‘पूजा टकसार पंथ’’ है। छठा वंश ‘‘उदास’’ यह ‘‘भगवान दास पंथ’’ सातवां वंश ‘‘ज्ञान चतुराई’’ यह सत्यनामी पंथ है। आठवाँ वंश ‘‘द्वादश पंथ विरोद्ध’’ यह कमाल का पंथ है। नौवाँ वंश ‘‘पंथ पूजा’’ यह राम कबीर पंथ है। दशवाँ वंश प्रकाश यह प्रेमधाम (परम धाम) की वाणी पंथ है। ग्यारहवाँ वंश ‘‘प्रकट पसारा’’ यह जीवा पंथ है। बारहवाँ वंश ‘‘गरीबदास पंथ’’ है। तेरहवाँ वंश यह यथार्थ कबीर पंथ है जो मुझ दास (सन्त रामपाल दास) द्वारा बिचली पीढ़ी के उद्धार के लिए प्रारम्भ कराया है। कबीर परमेश्वर ने अपनी वाणी में काल से कहा था कि तेरे बारह पंथ चल चुके होगें तब मैं अपना नाद (वचन-शिष्य परम्परा वाला) वंश अथार्त् अंस भेजेगें उसी आधार पर यह विवरण लिखा है। बारहवां वंश (अंश) सन्त गरीबदास जी से कबीर वाणी तथा परमेश्वर कबीर जी की महिमा का कुछ-कुछ संस्य युक्त ज्ञान विस्तार होगा। जैसे सन्त गरीबदास जी की परम्परा में परमेश्वर कबीर जी को विष्णु अवतार मान कर साधना तथा प्रचार करते हैं। संत गरीबदास जी ने ‘‘असुर निकन्दन रमैणी’’ में कहा है ‘‘साहेब तख्त कबीर खवासा। दिल्ली मण्डल लीजै वासा। सतगुरू दिल्ली मण्डल आयसी, सूती धरणी सूम जगायसी’’ भावार्थ है कि सन्त गरीबदास जी वाला बारहवाँ पंथ (अंश) तो काल तक साधना बताने वाला कहा है। इसलिए केवल कबीर महिमा की वाणी ही संत गरीबदास जी द्वारा प्रकट की गई है। उसमें कहा है कि कबीर परमात्मा के तख्त अथार्त् सिंहासन का ख्वास अर्थात् नौकर दिल्ली के आस-पास के क्षेत्र में आएगा वह उस क्षेत्र के कृपण अर्थात् कंजूस व्यक्तियों को परमात्मा की महिमा बता कर जगाएगा अर्थात् दान-धर्म में उनकी रूची बढ़ाएगा। वह तेरहवाँ अंश कबीर परमात्मा के दरबार का उच्चतम् सेवक होगा। वह कबीर परमेश्वर का अत्यंत कृपा पात्र होगा। ऋग्वेद मण्डल 1 सुक्त 1 मन्त्र 7 में उप अग्ने अथार्त् उप परमेश्वर कहा है। इसलिए पूर्ण परमात्मा अपना भेद छुपा कर दास रूप में प्रकट होकर अपनी महिमा करता है। इसलिए उसी परमेश्वर को ऋग्वेद मण्डल 10 सुक्त 4 मन्त्र 6 में तस्करा अथार्त् आँखों मे धूल झोंक का कार्य करने वाला तस्कर कहा है। श्री नानक जी ने उसे ठगवाड़ा कहा है। इसलिए तेरहवें अंश को (सन्त रामपाल दास को) उनका दास जाने चाहे स्वयं पूर्ण प्रभु का उपशक्तिरूप (उप अग्ने्) समझें। इसलिए लिखा है कि बारहवें अंश की परम्परा में हम ही चलकर तेरहवें अंश रूप में आएंगे। वह तेरहवां वंश (अंस) पूर्ण रूप से अज्ञान अंधेरा समाप्त करके परमेश्वर कबीर जी की वास्तविक महिमा तथा नाम का ज्ञान करा कर सभी पंथों को समाप्त करके एक ही पंथ चलाएगा, वह तेरहवां वंश हम (परमेश्वर कबीर) ही होंगे।

कबीर वाणी (कबीर सागर) पृष्ठ 136 पर :-

बारह पंथों का विवरण दिया है। बारहवें पंथ (गरीबदास पंथ, बारहवां पंथ लिखा है कबीर सागर, कबीर चरित्र बोध पृष्ठ 1870 पर) के विषय में कबीर सागर कबीर वाणी पृष्ठ नं. 136-137 पर वाणी लिखी है कि :-

द्वादश पंथ चलो सो भेद

द्वादश पंथ काल फुरमाना। भूले जीव न जाय ठिकाना।।  
प्रथम आगम कहि हम राखा। वंश हमार चूरामणि शाखा।
दूसर जगमें जागू भ्रमावै। विना भेद ओ ग्रन्थ चुरावै।।
तीसरा सुरति गोपालहि होई। अक्षर जो जोग दृढ़ावे सोई।।
चैथा मूल निरंजन बानी। लोकवेद की निर्णय ठानी।।
पंचम पंथ टकसार भेद लै आवै। नीर पवन को सन्धि बतावै।।
सो ब्रह्म अभिमानी जानी। सो बहुत जीवन की करी है हानी।।
छठवाँ पंथ बीज को लेखा। लोक प्रलोक कहें हममें देखा।।
पांच तत्व का मर्म ²ढावै। सो बीजक शुक्ल ले आवै।।
सातवाँ पंथ सत्यनामि प्रकाशा। घटके माहीं मार्ग निवासा।।
आठवाँ जीव पंथले बोले बानी। भयो प्रतीत मर्म नहिं जानी।।
नौवें राम कबीर कहावै। सतगुरू भ्रमले जीव ²ढावै।।
दसवें ज्ञान की काल दिखावै। भई प्रतीत जीव सुख पावै।। 
ग्यारहवें भेद परमधाम की बानी। साख हमारी निर्णय ठानी।।
साखी भाव प्रेम उपजावै। ब्रह्मज्ञान की राह चलावै।।
तिनमें वंश अंश अधिकारा। तिनमें सो शब्द होय निरधारा।।
सम्वत् सत्रासै पचहत्तर होई, तादिन प्रेम प्रकटें जग सोई।।
आज्ञा रहै ब्रह्म बोध लावे। कोली चमार सबके घर खावे।।
साखी हमारी ले जीव समझावै, असंख्य जन्म ठौर नहीं पावै।।
बारवें पंथ प्रगट ह्नै बानी, शब्द हमारे की निर्णय ठानी।।
अस्थिर घर का मरम न पावैं, ये बारा पंथ हमही को ध्यावैं।
बारवें पंथ हम ही चलि आवैं, सब पंथ मेटि एक ही पंथ चलावें।।
तब लगि बोधो कुरी चमारा। फेरी तुम बोधो राज दर्बारा।।
प्रथम चरन कलजुग नियराना। तब मगहर माडौ मैदाना।।
धर्मराय से मांडौ बाजी। तब धरि बोधो पंडित काजी।।
धर्मदास मोरी लाख दुहाई, मूल (सार) शब्द बाहर नहीं जाई।
मूल (सार) ज्ञान बाहर जो परही, बिचली पीढी हंस नहीं तरहीं।
तेतिस अर्ब ज्ञान हम भाखा, तत्वज्ञान गुप्त हम राखा।
मूलज्ञान (तत्वज्ञान) तब तक छुपाई, जब लग द्वादश पंथ न मिट जाई।

कबीर सागर अध्याय जीव धर्म बोध (बोध सागर) पृष्ठ 1937 पर लिखा है :-

पुस्तक "कबीर सागर" अध्याय जीव धम र् बोध (बोध सागर) पृष्ठ 1937 पर प्रमाण :-

धर्मदास तोहि लाख दुहाइ। सार शब्द बाहर नहिं जाई।।
सारशब्द बाहर जो परि है। बिचलै पीढी हंस नहीं तरि है।।

युगन-युगन तुम सेवा किन्ही। ता पीछे हम इहां पग दीनी।।
कोटिन जन्म भक्ति जब कीन्हा। सार शब्द तब ही पै चीन्हा।।
अंकूरी जीव होय जो कोई। सार शब्द अधिकारी सोई।।
सत्यकबीर प्रमाण बखाना। ऐसो कठिन है पद निर्वाना।।

कबीर सागर ‘‘कबीर बानी’’ नामक अध्याय (बोध सागर) पृष्ठ नं. 134 से 138 पर लिखे विवरण का भावार्थ है :-

पृष्ठ नं. 134 पर बारह वंशों (अंसों) के बाद तेरहवें वंश (अंस) में सब अज्ञान अंधेरा मिट जाएगा। संत गरीबदास पंथ तक काल के बारह वंश अपनी.2 चतुरता दिखाएगें। पृष्ठ नं. 136.137 पर ‘‘बारह पंथों’’ का विवरण किया है तथा लिखा है कि संवत् 1775 में प्रभु का प्रेम प्रकट होगा तथा हमरी बानी प्रकट होवेगी। (संत गरीबदास जी महाराज छुड़ानी हरियाणा वाले का जन्म 1774 में हुआ है उनको प्रभु कबीर 1784 में मिले थे। यहाँ पर इसी का वण र्न है तथा सम्वत् 1775 के स्थान पर 1774 होना चाहिए, गलती से 1775 लिखा है दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि संत गरीब दास जी का जन्म वैशाख मास की पूर्णमासी को हुआ। संवत् वाला वर्ष चैत्र से प्रारम्भ होता है जो वैसाख मास के साथ वाला है। कई बार तिथीयों के घटने बढ़ने से दो मास बन जाते हैं। उस समय शिक्षा का अभाव था तिथी व संवत् बताने वाले भी अशिक्षित होते थे। जिस कारण से संवत् 1775 के स्थान पर गरीबदास जी का जन्म संवत् 1774 लिखा गया होगा परन्तु यह संकेत संत गरीबदास जी की ओर है।)।

भावार्थ है कि बारहवां पंथ जो गरीबदास जी का चलेगा उस पंथ सहित अर्थात् उपरोक्त बारह पंथों के अनुयाइ मेरी महिमा का गुणगान करेगें तथा हमारी साखी लेकर जीव को समझाएगें। परन्तु वास्तविक मन्त्र के अपरिचित होने के कारण साधक असंख्य जन्म सतलोक नहीं जा सकते। उपरोक्त बारह पंथ हमको ही प्रमाण करके भक्ति करेगें परन्तु स्थाई स्थान (सतलोक) प्राप्त नहीं कर सकते। बारहवें पंथ (गरीबदास वाले पंथ) में आगे चलकर हम (कबीर जी) स्वयं ही आएंगे तथा सब बारह पंथों को मिटा एक ही पंथ चलाऐगें। उस समय तक सारशब्द तथा सारज्ञान (तत्वज्ञान) छुपा कर रखना है। यही प्रमाण सन्त गरीबदास जी महाराज ने अपनी अमृतवाणी ‘‘असुर निकंन्दन रमैणी’’ में किया है कि

‘‘सतगुरू दिल्ली मण्डल आयसी, सूती धरती सूम जगायसी’’

पुराना रोहतक जिला (वत र्मान में, सोनीपत, झज्जर तथा रोहतक जो पहले एक ही जिला था) दिल्ली मण्डल कहलाता है। जो पहले अग्रेंजों के शासन काल में केन्द्र के आधीन था। मुझ दास का पैत्रिक गाँव धनाना इसी पुराने रोहतक जिले में है। सन् 1951 में मेरा (संत रामपाल का) जन्म हुआ था। बारह पंथों का विवरण कबीर चरित्र बोध (बोध सागर) पृष्ठ नं. 1870 पर भी है जिसमें बारहवां पंथ गरीबदास लिखा है।

कबीर साहेब के पंथ में काल द्वारा प्रचलित बारह पंथों का विवरण (कबीर चरित्र बोध (कबीर सागर) पृष्ठ नं. 1870 से) :- (1) नारायण दास जी का पंथ (2) यागौदास (जागू) पंथ (3) सूरत गोपाल पंथ (4) मूल निरंजन पंथ (5) टकसार पंथ (6) भगवान दास (ब्रह्म) पंथ (7) सत्यनामी पंथ (8) कमाली (कमाल का) पंथ (9) राम कबीर पंथ (10) प्रेम धाम (परम धाम) की वाणी पंथ (11) जीवा पंथ (12) गरीबदास पंथ।

विशेष :- यहाँ पर प्रथम प ंथ का संचालक नारायण दास लिखा है जबकी कबीर वाणी (कबीर सागर) पृष्ठ 136 पर प्रथम पंथ का संचालक चूरामणी लिखा है, शेष प्रकरण ठीक है। इसमें भी दामाखेड़ा वाले अनुयाइयों ने चुड़ामणी को हटाने का प्रयत्न किया है। उसके स्थान पर नारायण दास लिख दिया। जबकि नारायण दास तो बिल्कुल विपरित था। उसका तो विनाश हो गया था। इसलिए प्रथम पंथ चुड़ामणी जी का ही मानना चाहिए। दूसरी बात है कि कबीर वाणी (कबीर सागर) पृष्ठ नं136 पर लिखी वाणी में चूड़ामणी को मिला कर ही बारह पंथ बनते हैं।

विचार करें- अब वही एक पंथ मुझ दास (रामपाल दास) द्वारा परमेश्वर कबीर जी की आज्ञा व शक्ति से चलाया जा रहा है जो सभी पंथों को एक करेगा।

Last update: March 28th, 2020