Kabir Panth

Which is the only True Kabir Panth in this Universe?

Reality of Damakheda, Kharsiya and Lahar Tara - Kashi (Varanasi) Kabir Panth Lineage

The knowledge about 42 generations (vansh) of Saint Dharamadas ji and native seats of Damakheda, Kharsiya and Lahar Tara Kashi (Varanasi) and the mahants maintaining the seats.

  • Supreme God Kabir Sahib

    पूर्ण ब्रह्म कबीर साहिब

    Which is the only True Kabir Panth in this Universe?

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  • Descendents of Sant Dharamdas Ji


    Question: The people of the native seat of Saint Dharmdas ji Damakheda say that salvation is possible by taking initiation from this native seat?

    Answer: The eldest son of Saint Dharmdas ji, Shri Narayan Das, was a messenger sent by Kaal. Even on repeated persuasion, he did not take initiation from Supreme God Kabir Sahib.

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  • Fourteenth Mahant Native Seat


    Introduction of the Fourteenth Mahant Native Seat - Book "Dhani Dharmdas Jeevan Darshan Evam Vansh Parichay" on page 49 - After the thirteenth Mahant Dayanaam, turmoil arose in Kabir Panth. The wheel of Kaal began to turn. Because there was no son in this succession, until then to maintain state, Mahant Kashidas ji was given the authority.

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  • Amazing Secret in Kabir Sagar


    "Anurag Sagar" - This Adhyay is a part of Kabir Sagar only.

    The redactor of the present Kabir Sagar, Shri Yuglanand Bihari (publisher and printer - Khemraj Shri Krishan Das, Shri Venkateshwar Press, Mumbai) has written in his preface that I have 46 copies of Anurag Sagar, in which there are hand-written and printed.

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संत धर्मदास जी के वंशों के विषय में जानकारी


प्रश्न: संत धर्मदास जी की गद्दी दामा खेड़ा वाले कहते हैं कि इस गद्दी से नाम प्राप्त करने से मोक्ष संभव है ?

उत्तर: संत धर्मदास जी का ज्येष्ठ पुत्रा श्री नारायण दास काल का भेजा हुआ दूत था। उसने बार-बार समझाने से भी परमेश्वर कबीर साहेब जी से उपदेश नहीं लिया। पुत्रा प्रेम में व्याकुल संत धर्मदास जी को परमेश्वर कबीर साहेब जी ने नारायण दास जी का वास्तविक स्वरूप दर्शाया। संत धर्मदास जी ने कहा कि हे प्रभु !

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दामाखेड़ा चैदहवीं महंत गद्दी का परिचय


पुस्तक “धनी धर्मदास जीवन दर्शन एवं वंश परिचय” पृष्ठ 49 पर तेरहवें महंत दयानाम के बाद कबीर पंथ में उथल-पुथल मची। काल का चक्र चलने लगा। क्योंकि इस परम्परा में कोई पुत्रा नहीं था। तब तक व्यवस्था बनाए रखने के लिए महंत काशीदास जी को चादर दिया गया। कुछ समय पश्चात् काशी दास ने स्वयं को कबीर पंथ का आचार्य घोषित कर दिया तथा खरसीया में अलग गद्दी की स्थापना कर दी।

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पवित्र कबीर सागर में अद्धभुत रहस्य


अनुराग सागर:- यह अध्याय कबीर सागर का ही अंग है। वर्तमान कबीर सागर के संशोधन कर्ता श्री युगलानन्द बिहारी (प्रकाशक एवं मुद्रक-खेमराज श्री कृष्ण दास, श्री वेंकेटेश्वर प्रैस मुंबई) द्वारा अपने प्रस्तावना में लिखा है कि मेरे पास अनुराग सागर की 46 (छियालिस) प्रतियाँ हैं। जिनमें हस्त लिखित तथा प्रिन्टिड हैं। सभी की व्याख्या एक दूसरे से भिन्न हैं। अब मैंने (श्री युगलानन्द जी ने) शुद्ध करके सत्य विवरण लिखा है।

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Video on Knowledge about 42 generations (vansh) of Saint Dharamadas ji